Saturday, 4 July 2015

खोज जारी है

आरंभ वही है जो प्रचंड है और प्रचंड वही जो हृदय की गहराइयों से निकला है अर्थात जिसमे आडंबर का रत्ती भर समावेश नही समझिये गन्ना खेत से उखड़ा और मेड किनारे बैठ के चौसना शुरू....जिस आरंभ में ही नीरसता है उस आरंभ का समझिये अंत भी वही है ना किसी ज्योतिष को पटरी दिखने कि जरूरत ना किसी सलाहकार से सलाह लेने का झंझट
बिना किसी लाग लपेट के सीधे बात पे आता हूँ जिसके लिए आज अँगरेजी दिनांक 7 जुलाई 2015 को प्रातः 6:30 बजे संकल्प भवन में गौरव जी के संगदक को स्व्यं से ज्यादा तकलीफ दे रहा हूँ....
आंतरिक यक्ष का समाना कर रहा हूँ मैं
और शायद मुझ जैसे अनगिनत
प्रश्न ऐसा जो चिरकल से है जीवित
किन्तु फिर भी है अनुत्तरित
प्रश्न "कि मैं इस भू पर क्यूँ हूँ?"
प्रश्न "मेरा क्या है औचित्य?"
उत्तर को पाने का प्रयास हर पल जारी है और हर पल उत्तर के बदल जाने की प्रक्रिया भी जारी है
जब इंद्रियों के वश में हूँ तब "भोग" है मेरे जीवन का लक्ष्य
जब विवेक के वश में हूँ तब "योग " है मेरे जीवन का लक्ष्य
इस प्रातः काल की वेला में निश्चित ही विवेक के वश  में हूँ जो "यक्ष महाराज" को शांत करने का एक और निष्फल प्रयास कर रहा हूँ  लेकिन यह प्रयास मेरे अस्तित्व रहने तक जारी रहेगा
क्यूंकि इतने प्रयासों से इस प्रश्न का तो उत्तर  मिला ही है कि मेरी तरह यही यक्ष "बुद्ध ,महावीर,विवेकानंद,परमहंस " के समक्ष भी आया था और यह भी पता है की वे इसमें सफल हुए थे.

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