बहुत दिनों बाद स्वयं के विचारों को लिपिबद्ध करने की इच्छा को मूर्त रूप देना प्रारम्भ करने से चंद लम्हे पहले विचारों को किसी और दिशा में पा रहा हूँ और चाहता हूँ की आज इसी दिशा में बह चलूँ।
खैर ,आज फेसबुक की दुनिया में विचरते हुए बहुत सी बातें जानी किन्तु जो बात सबसे अधिक मेरा दिल ,दिमाग,ह्रदय या यूं कहूँ कि मेरे अंदर के "मैं" को अपनी ओर आकृष्ट करती है उसी बात का जिक्र करने जा रहा हूँ। जैसे ही अपनी दैनिक दिनचर्या के एक हिस्से यानि फेसबुक को खोलता हूँ तो मेरी नजरें करीने से सजाई हुई कुछ खाद्य सामग्री सी प्रतीत होती कुछ पकी कुछ अधपकी सी वस्तुओं पर जाकर टिक जाती हैं। नज़रों के बाद दिमाग भी वहीँ जाता है और मुझे बताता है कि "कृष्णकुमार शर्मा " ये वस्तु कुछ और नहीं बल्कि तेरी गौ-माता के टुकड़े हैं जिसका इस्तेमाल कुछ लोग अपनी जिह्वा की क्षुदा शांत करने के लिए करने वाले हैं। एक समझदार व्यक्ति की तरह मैंने इस मौके का फायदा स्वयं से कुछ प्रश्न करने में लगा पता नहीं कितनी समझदारी की।
पहला प्रश्न था -आखिर हिन्दू समाज मे गौ को माता स्वरुप क्यों माना गया ?आखिर गौ को ही क्यों माता स्वरुप माना गया ? आखिर हिन्दुओं ने ही इसकी ठेकेदारी क्यों ली ? चिंतन के बाद मुझे मालूम हुआ की गौ-माता से मेरा पुत्र और माता का रिश्ता मेरे जन्म के पहले क्षण से ही प्रारम्भ होता है क्यूंकि मैं एक सनातनी रूप से धार्मिक परिवार में जन्म का सौभाग्य पाया हूँ। आज इस रिश्ते में खटास डालने का प्रयास मेरे ही एक मित्र ने किया तो अच्छा लगा क्यूंकि इसके बाद से मेरा और गौ-माता का अन्धविश्वास से भरा रिश्ता अब कभी न टूट सकने वाले विश्वास से भर जाएगा।
प्रश्नों का उत्तर देते हुए मैंने स्वयं को बताया कि मैंने गाय को माता मानकर कोई गलती नहीं की है क्यूंकि गलती वह होती है जिसे करने के बाद किसी का कोई नुक्सान हो किन्तु मुझे ऐसा कदापि नहीं दीखता। मैं गौ-माता को पहली रोटी देता हूँ तो उससे देश में अनाज की कमी नहीं हो जाती। मैं गौधन अर्क से स्नान करता हूँ उससे शरीर को कीटाणु-मुक्त कर कोई पाप तो मै करता नहीं (कीटाणु-हत्या को छोड़). गाय के दुग्ध को पी स्वयं के शरीर को पुष्ट बनाने का प्रयास करता हूँ तो यह भी कोई गैर-मर्यादा नहीं। निष्कर्ष निकला कि गौ "गौ-माता" इसलिए क्यूंकि माता की भांति पुत्र को कितना दिया उसे स्वयं भी नहीं पता.
इस प्रश्न का उत्तर मिलने से पहले ही एक और प्रश्न मुंह बाये खड़ा था कि आखिर हिन्दू समाज ही क्यों इस रिश्ते को निभाता चला आ रहा है अनवरत काल से। स्वयं से ही जवाब आया कि सत्य को जाने सब पर पहचाने वही जो जागृत है और जो जागृत है वही हिन्दू है ,ऐसा नहीं कि जो हिन्दू है वही जागृत है। समाप्त करने से पहले सभी अजागृत हिन्दुओं को धन्यवाद जिन्होंने मेरे अंध-विश्वास से भरे रिश्ते को न टूट सकने वाले तार्किक रिश्ते में तब्दील करने में महती भूमिका निभायी है और मेरे पूर्वजों में मेरी आस्था को और बढ़ाया है।
अंत में ईश्वर से इसी प्रार्थना के साथ की सब सत्य को बस जाने ही ना पहचाने भी इस चिंतन को यहीं विराम देता हूँ।
गौ-माता की जय।
खैर ,आज फेसबुक की दुनिया में विचरते हुए बहुत सी बातें जानी किन्तु जो बात सबसे अधिक मेरा दिल ,दिमाग,ह्रदय या यूं कहूँ कि मेरे अंदर के "मैं" को अपनी ओर आकृष्ट करती है उसी बात का जिक्र करने जा रहा हूँ। जैसे ही अपनी दैनिक दिनचर्या के एक हिस्से यानि फेसबुक को खोलता हूँ तो मेरी नजरें करीने से सजाई हुई कुछ खाद्य सामग्री सी प्रतीत होती कुछ पकी कुछ अधपकी सी वस्तुओं पर जाकर टिक जाती हैं। नज़रों के बाद दिमाग भी वहीँ जाता है और मुझे बताता है कि "कृष्णकुमार शर्मा " ये वस्तु कुछ और नहीं बल्कि तेरी गौ-माता के टुकड़े हैं जिसका इस्तेमाल कुछ लोग अपनी जिह्वा की क्षुदा शांत करने के लिए करने वाले हैं। एक समझदार व्यक्ति की तरह मैंने इस मौके का फायदा स्वयं से कुछ प्रश्न करने में लगा पता नहीं कितनी समझदारी की।
पहला प्रश्न था -आखिर हिन्दू समाज मे गौ को माता स्वरुप क्यों माना गया ?आखिर गौ को ही क्यों माता स्वरुप माना गया ? आखिर हिन्दुओं ने ही इसकी ठेकेदारी क्यों ली ? चिंतन के बाद मुझे मालूम हुआ की गौ-माता से मेरा पुत्र और माता का रिश्ता मेरे जन्म के पहले क्षण से ही प्रारम्भ होता है क्यूंकि मैं एक सनातनी रूप से धार्मिक परिवार में जन्म का सौभाग्य पाया हूँ। आज इस रिश्ते में खटास डालने का प्रयास मेरे ही एक मित्र ने किया तो अच्छा लगा क्यूंकि इसके बाद से मेरा और गौ-माता का अन्धविश्वास से भरा रिश्ता अब कभी न टूट सकने वाले विश्वास से भर जाएगा।
प्रश्नों का उत्तर देते हुए मैंने स्वयं को बताया कि मैंने गाय को माता मानकर कोई गलती नहीं की है क्यूंकि गलती वह होती है जिसे करने के बाद किसी का कोई नुक्सान हो किन्तु मुझे ऐसा कदापि नहीं दीखता। मैं गौ-माता को पहली रोटी देता हूँ तो उससे देश में अनाज की कमी नहीं हो जाती। मैं गौधन अर्क से स्नान करता हूँ उससे शरीर को कीटाणु-मुक्त कर कोई पाप तो मै करता नहीं (कीटाणु-हत्या को छोड़). गाय के दुग्ध को पी स्वयं के शरीर को पुष्ट बनाने का प्रयास करता हूँ तो यह भी कोई गैर-मर्यादा नहीं। निष्कर्ष निकला कि गौ "गौ-माता" इसलिए क्यूंकि माता की भांति पुत्र को कितना दिया उसे स्वयं भी नहीं पता.
इस प्रश्न का उत्तर मिलने से पहले ही एक और प्रश्न मुंह बाये खड़ा था कि आखिर हिन्दू समाज ही क्यों इस रिश्ते को निभाता चला आ रहा है अनवरत काल से। स्वयं से ही जवाब आया कि सत्य को जाने सब पर पहचाने वही जो जागृत है और जो जागृत है वही हिन्दू है ,ऐसा नहीं कि जो हिन्दू है वही जागृत है। समाप्त करने से पहले सभी अजागृत हिन्दुओं को धन्यवाद जिन्होंने मेरे अंध-विश्वास से भरे रिश्ते को न टूट सकने वाले तार्किक रिश्ते में तब्दील करने में महती भूमिका निभायी है और मेरे पूर्वजों में मेरी आस्था को और बढ़ाया है।
अंत में ईश्वर से इसी प्रार्थना के साथ की सब सत्य को बस जाने ही ना पहचाने भी इस चिंतन को यहीं विराम देता हूँ।
गौ-माता की जय।
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